चमत्कार

‘चमत्कार’……….. ये शब्द प्राय: प्रत्येक संत महात्मा के साथ जुड़ा होता ही है बस शर्त ये है की वो असली संत होना चाहिए।

संत महात्माओ की इस अनचाही खासियत के कारण बहुत से पाखंडी लोग भी स्वयं संत महात्मा जैसा वेश धारण करके लोगो को बेवकूफ बनाते हैं और कामयाब भी हो जाते हैं, क्योकि हमारे देश में वास्तविक संत महात्माओ की बहुत गौरवशाली विरासत है इस कारण लोगो की संत वेश भूषा वाले लोगों में बहुत श्रद्धा होती है, लोग आसानी से असली संतो के प्रति श्रद्धा भाव से युक्त होने के कारण नकली संतो (पाखंडियो) द्वारा ठग लिए जाते हैं।

जबकि सच्चाई ये है की असली संत कभी ना तो स्वयं “प्रत्यक्ष” चमत्कार दिखाता है और ना ऐसी किसी कोशिश का समर्थन करता है। क्योकि ऐसा करना कुदरत के नियमो में दखल देना होता है, और संत जो भगवान् का प्रतिनिधि होता है वो ऐसा कदापि नहीं करता। कोई भी वास्तविक संत कभी भी भगवान् के बनाये नियमो का उल्लंघन नहीं करता। परन्तु फिर भी कभी कभी वास्तविक संत महात्माओ द्वारा भी चमत्कार करने के उदाहरण देखने सुनने में आते है।

कृपामयी संत कभी कभी किसी की श्रद्धा बढ़ाने या किसी की भक्ति करने में बाधक बन रहे किसी प्रारब्ध को काटने के लिए चमत्कार कर दिया करते हैं ऐसा वे सिर्फ अपवादस्वरूप और जीवो को भगवान् की भक्ति करने के लिए प्रेरित करने के लिए करते है और ऐसा भी सिर्फ सगुण साकार के उपासक संतो में देखने में आता है, निर्गुण निराकार के भक्त संतो में ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने सुनने को मिलते है। चमत्कार करके और स्वयं की मान बड़ाई करवाना, ये कभी किसी किसी वास्तविक संत महात्मा का लक्षण नहीं हो सकता।

संतों के चमत्कार भगवान में श्रद्धा बढ़ाने वाले होते हैं, लोग और अधिकाधिक भगवान की भक्ति करें इसलिए। भगवान् से अपने लिए कुछ माँगना छोड़कर सिर्फ उनका प्रेम चाहते हैं संत।

संत सिद्धियों का प्रदर्शन नहीं करते। मात्र सांसारिक जड़ वस्तुओ में प्लस माइनस करने, उनमे हलचल मचाने से अलग और कुछ नहीं है, कोई हाथ में मनचाहे फूल की खुशबु पैदा कर दे, कोई पानी पर चलने लग जाए , इस सब से क्या होगा? क्या आत्मा का इससे कोई भला होता है? उसके लिए तो आपको भगवान से ही सम्बन्ध जोड़ना पड़ेगा, उनकी भक्ति करनी पड़ेगी, उनको अपना मानना पड़ेगा, दूसरा कोई विकल्प नहीं है, कोई ऐसा संत जो बिना किसी को साधना करवाये ही भगवत् प्राप्ति करवा दे? है क्या किसी के पास ऐसी सिद्धि? अगर संसारी जड़ पदार्थो में ऊंचा नीचा करना ही सिद्धि है तो वो खुद क्यों बाबाजी बना हुआ है? उसने क्यों नहीं संसार भोगा? खुद संसार को त्याग कर ‘बाबाजी’ क्यों बन गया। इसलिए भगवान की निष्काम भक्ति करने से ही काम बनेगा।

अधिकारी जीवों को संतों के अनेकानेक अनुभव हैं, लेकिन संतों की स्पष्ट आज्ञा होती है की यदि किसी को भगवान् के पथ पर आगे बढ़ते हुए कोई अनुभव हो तो उसे अपने तक सीमित रखना चाहिए, जिसका उद्देश्य “लोकरंजन” का है वो कदापि भगवान् के निकट नहीं पहुच सकता। अपने अनुभवो को अपने तक रखने से और इसे भगवान् की कृपा मानकर बार बार इसका चिंतन करने से भगवान् में आपकी श्रद्धा दृढ़ होती है और आप और तेजी और विश्वास से भगवान् की तरफ बढ़ते हैं।

सबकी श्रद्धा बढ़े, भगवद्ग विश्वास बढ़े, सबका कल्याण हो, इसलिए श्रद्धावान को बताने का अपवाद है।
राधे राधे 🙏

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