हम अज्ञानता वश धन-संपत्ति, भोग-कामना, मान-सम्मान आदि की लोलुपता और चिंता में अनवरत अनावश्यक श्रम और समय देकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ कर देते हैं। जो प्रारब्ध से निर्धारित है वो अवश्य मिलेगा – जो हमने पूर्व जन्म में पुण्य किए हैं – दान, दया, त्याग, सेवा आदि से निर्धारित और कभी कभी इसी जन्म में किय विशेष पुण्य कर्मों पे आधारित, अगर कोई प्रबल प्रारब्ध बंधन न हो। संयोग से अधिक कुछ जो आ जाएगा वो चला जाएगा।
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥
~ पंचतंत्र मित्रसमप्राप्ति 112
अर्थ: मनुष्य को जो प्राप्त होना होता है, उसका उल्लंघन करने में देवता भी समर्थ नहीं हैं इसलिए मुझे न आश्चर्य है और न शोक क्योंकि जो मेरा है वह किसी दूसरे का नहीं है।
प्रारब्ध से परिस्थिति वश जो दुख आता है वो सीमित होता है। हम ज्यादातर दुख अपनी अज्ञानता, आसक्ति और मूर्खता वश पाते हैं, अपने और संसार के सही सही स्वरूप का ज्ञान ना होने के कारण।
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥
~ रामचरितमानस
आयुः कर्मं च वितं च विद्यानिधन मेवI
पंञ्चैतान्यायं सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनःII
~ नीतिसार
अर्थ (धन-सम्पत्ति) और भोग (कामनाओं की पूर्ति) में प्रारब्ध की प्राथमिकता है और धर्म (कर्तव्य-कर्म, सही-गलत ) और मोक्ष ( मुक्ति और भगवद्गप्राप्ति) में पुरूषार्थ की। इसलिए अनावश्यक अनवरत श्रम ना करके धार्मिक जीवन के साथ भगवद् प्रवृत्त चिंतन में समय देना चाहिए।
प्रारब्ध पहले रचा पीछे रचा शरीर,
तुलसी चिन्ता क्यों करे भज ले श्री रघुवीर।
~ तुलसी दोहावली
मुरदे को हरि देत है, कपड़ा लकड़ी आग।
जीवित नर चिन्ता करे, उनका बड़ा अभाग।।
~ संत कबीर दास जी
घर नहीं ग्रहस्थी नहीं, नहीं रुपैयो रोक।
खाने बैठे रामदास, आन मिलै सब थोक।।
~ संत वाणी
समुद्र-मथने लेभे हरिः, लक्ष्मीं हरो विषम्।
भाग्यं फलति सर्वत्र ,न च विद्या न पौरुषम्॥
~ नीतिविवेक
अगर हम कर्म रहस्य समझ ले तो चिंता मुक्त हो जाए, सुख में हर्षित ना हो और दुख में शोकित ना हों, नए कर्म बंधन में ना फंसे, समता के साथ अपना कर्तव्य पालन करते हुए प्रभु प्रेम में मगन रहें।
जीव का परम चरम लक्ष्य भगवान को पाना है ना कि संसार में समय गवाना है। जिस आनंद की हमारी चाह है वह जड़ नश्वर संसार में नहीं अपितु भगवान में है क्योंकि भगवान ही असली आनंद हैं!
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।
~ तैत्तिरीय उपनिषद – भृगु वल्ली – 3-6-1
भगवान ने प्रारब्ध हमे चिंता से मुक्त करने के लिय बनाया है और पुरुषार्थ अपना कर्तव्य कर्म करते हुए उन्हें पाने के लिए।
~ राधाकृष्ण दास
