Who is bigger sinner than me? को मो सम पतित बड़ो?

Only by accepting our faults in humility, we can experience Divinity.

दीनतापूर्वक अपने दोषों को स्वीकार करने पर ही हम दिव्यता का अनुभव कर सकते हैं।

मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नमकहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥
~ संत सूरदास